Saturday, September 19, 2009

"प्रकृति का सत्य-रूप"

पदार्थ : MATTER

सृष्टी जो हमारे इर्द-गिर्द फेली होई हे , वो स्वतंत्र रूप से आभासित हो रही हे ,जिस कारण हम
उसको जान पाते हैं ! पदार्थ का ये गुण हे की वह ,अपने आप को बाहर आभासित करवाता हे,
जिसके कारण हम इन्द्रियों द्वारा पदार्थ को जान पाते हैं !
The universe spread all around us, is freely appearing in itself ,
because of which we know it. It is the property of MATTER that
it let itself APPEAR EXTERNALLY , because of which we know the
matter by our SENSES.
मेरे दोस्त मेरा ऐसा मानना हे कि जैसे मनुष्य मै शारीर वा आत्मा होती हे
और आत्मा का प्रकाश ( उपस्थिति )इन्द्रियों को कार्य के लिए प्रेरित करता हे
ठीक इसीप्रकार पदार्थ मै भी जड़ वा चेतनता होती हे !पदार्थ कि जड़ता उसके
गुणों के कारण हे ,जबकि पदार्थ कि चेतनता पदार्थ के गुणों को एक शारीर
बन 'स्थिरता' देता हे ! पदार्थ मै चेतनता कि उपस्थिति ही ,पदार्थ को लक्षणों द्वारा 
 "स्वतंत्र आभासित' करवाती हे !
उदाहरण के लिए :
'Black Hole' मै सभी पदार्थ मृत्यु को प्राप्त कर विज्ञानं की पकड़ मै नष्ट हो जाते हैं !
हम ये भी जानते हैं पदार्थ कभी भी नष्ट नहीं हो सकता बलिक अपना रूप ही बदलता हे !
अंततः हमने समझा की पदार्थ स्वरुप बदलता हुआ जब Black Hole मै मृत्यु को प्राप्त
करता हे ! वह अपने चेतन-तत्व को खो देता हे , तब वह अपने को 'स्वतंत्र आभासित'
नहीं कर पाते हैं , ठीक उसी प्रकार जैसे मनुष्य मृत्यु को प्राप्त कर आत्मा को खो ,
शारीर से क्रियाशील नहीं रहता !


My friend , Im of this opinion that as the human being has body and
soul in it ,in the same way , MATTER has body and LIVINGness in it .
The body of Matter causes PROPERTIES in it, where as the LIVINGness
in matter 'stablises' the properties in the body of Matter ,and causes Matter to 'appear freely' through its charactertics.
As for example :By attaining DEATH in reaching BLACK HOLE, each Matter
VANISHES from the eye of science.We also that Matter can never be destroyed ,rather it changes its FORM.In the end we understand it
that MATTER by achieving DEATH in BLACK HOLE it looses LIVINGNESS and that disqualify it to APPEAR EXTERNALLY.

1 comment:

P A R D E E P said...

Prakriti ji aap ney theek kaha !

jo bhi ham sochate hein vo bhi ek naya ahsas ban ubharta hey ,
jo shabad hey , vo bhi ek ahsas hi dete hei 'arth' key rup mey !
yeh sach hey ji indriyon sey sunya sey anant ki dori nahi nappi ja sakti ;
yeh dori "AHSAS" mey hi napti hey prakrit!
chahe yeh ahsas kese hi apne prabhav mey ley hamko !
Soch ka ahsas jab anya ahsason key madya najar dekte hein ,
yeh ham mey sujh deta hey Prakriti !

Tipanni key liye dhanyavad !