Monday, December 22, 2008

आत्मा और हमारे कर्म : एक आधार

१) आत्मा कर्मो का साक्षी हें , कर्मो का अभिलाषी नही हें !
इन्द्रिय-ज्ञान जो बुधी को इन्द्रियों से मिलता हें ,
हमारे मन को चेष्टा से जोड़ता हें , जो संकल्प रूप ले
हमारी अभिलाषा कहलाता हें !
आत्मा कर्मो का साक्षी बन कर्मो को आधार प्रदान करता हें ;
और इस लिए कर्मो का कारन भी कहा जा सकता हें !
२) आत्मा पर माया का आवरण होता हें , शास्त्रों में लिखा हें !
यही आवरण , जन्म जन्म के संस्कारो को एक शरीर से
दूसरे शरीर में ले जाता हें !
३) संस्कार का अर्थ हें : संसर्ग में आने से मिला आकार !
हम जो कुछ भी इन्द्रियों से प्राप्त करते हें , वह बुधी में प्रकाशित होता हें ,
जो वृत्ति , इस ज्ञान को बुधी में प्रकाशित करती हें , जब अपने उद्गम
स्थान को वापसी करती हें तब माया के आवरण पर भी ,अपने
इन्द्रिय -ज्ञान का प्रभाव छोड़ देती हें जो संस्कार कहलाता हें !
४) आत्मा माया के आवरण से खुद को अलग रखना चाहता हें ,
जिससे परमतत्व खुद में संकुचन बनता हें , येही चेष्टा आवरण पर
उन्मोचन से ' वृत्ति ' का कारण बनती हें !
५) संस्कारो के आवरण से उठी वृत्ति , हमारी अभिलाषा और उस द्वारा हुए कर्मो में बहुत बड़ा योगदान रखती हे ! इसी विधि से ही हमको अपने पूर्व जन्मो के करम भोगने पड़ते हे! इस प्रकार आत्मा कर्मो को सीधा आधार नही दे सकता ! इस प्रकार हमारे करम संस्कारो से सीधे na जुड़ , संस्कारो में लिप्त हो जुड़ते हे !
६) अतः हम कह सकते हे की जब हम कर्मो को कमाना युक्त भाव से करते हे तब वे परमतत्व अंश आत्मा से सीधे न जुड़, आवरण प्रभाव के से जुड़ प्रकट होते हे ! दुसरे शब्दों में ' जब हम कर्मो को निष्काम भाव से करते हे , तब वे वृत्ति द्वारा आत्मा से उठ सीधे प्रकट होते हें !
७) इस प्रकार हमने समझा की जब करम अपने जनक ( आत्मा)के आगे प्रस्तुत होते हे तो पूरण हे , वरना अपूर्ण अवस्था में माया के आवरण पर संस्कार ही बनते हे ! अर्थात निष्काम भाव कर्मो में ; कारन से कार्य प्रकट हुआ , और अंतता कार्य अपने कारन में ही विलीन हो गया / या फिर प्रभाव -हीन हो गया .
इनको हम संस्कार -हीन करम भी कह सकते हें , जो pram-सुख karak हें .