Friday, September 18, 2009

" भीतर की आंखे "



आत्मा को सर्व-व्यापी , अविनाशी , तथा अचल अर्थात क्रिया-रहित माना गया हे ,

इसी प्रकार जगत को आत्मा से विपरीत नाशवान और चलायमान माना गया हे !

जो मनुष्य इस सत्य को समझ कर, स्वीकार कर लेता हे वो विवेकी कहलाता हे !

आत्मा और जगत मै जोभी तालमेल बैठता हे वह अंतःकरण के प्रभाव से होता हे !

आत्मा-ओजः संग ले, मन-बुधी-चित-अंहकार को प्रकाशित करना ही अंतःकरण हे !

अन्तःकरण के तीन दोष हैं आवरण, विक्षेप वा मल् जिस कारण"भेद" बना रहता हे !

"भेद" अर्थात आत्मा को ब्रह्म-सामान मान, विशाल प्रकृति को उससे अलग मानता हे !

जब सत्व-गुणी मै विवेक अपना प्रभाव दिखता हे तब ये "भेद" खुद ही मिट जाता हे !



प्रकृति को देख उसके सत्य स्वरुप का ज्ञान ना दे ,

उसके प्रकाशित गुणों को ही बुधी तक पहुँचाना ,

इसको आवरण कहते हैं जो विवेक से हटता हे !

उपासना से अंतःकरण पर विक्षेप दोष दूर होता हे,

जिससे हमारे भीतर "भावः" की उत्पत्ति होती हे !

निष्काम कर्म करने से अंतःकरण से "मल्" दोष का

निवारण होता हे, जो मन के विकार-बंधन कटता हे !



....दीप

Tuesday, September 15, 2009

"पहचान"






एक बूंद
पूछती हे सागर से
मेरी पहचान क्या हे ?

सागर मुस्कराया ,
बूंद को बुलाया ,
और बोला ....
मेरे आगोश मै आ जाओ ;
बूंद थोडी झिझ्कायी ,
कुछ समझ ना पाई ,
फिर भी पूछ ही लिया
आखिर क्यों ?
सागर भी थोडा सकपकाया ,
फिर बाजुओं को फेलाया ...
और बोला .....
जब तुम मुझ मै समाती हो ,
लगता हे तुम्हे खुद मै मिट जाती हो ,
हिम्मत कर जब विलय कर पाती हो ,
फिर अचम्भित सी सब समझ जाती हो ,
जब आगोश मै तुम अपने मुझको पाती हो ,
खुद की पहचान पाकर, मुझको भी पहचान दे जाती हो !

*....दीप*

Thursday, May 7, 2009

Mere bhagwan ji ki Prakriti

जय मेरे भोले

मेरे भगवान जी ने जब खुद को अहसास में लेना चाहा तो उनके इलावा कुछ ना था, परन्तु उनकी इस चेष्टा ने भीतर ही एक बहाव ला दिया, जिस से उनकी शक्ति जो समाधी-अवस्था मे विलीन थी, प्रेरित हो प्रकृति के रूप मे बढ़ने लगी जी! मेरे भगवन जी और प्रकृति मे कोई जयादा भेद नहीं हे जी; अब देखो अगर प्रकृति अपने जगमग जगमग गुणों को अपने भीतर समाधी-स्थिर कर ले तो क्या रह गया भगवन जी और प्रकृति मे भेद करने के लिए? अर्थात कुछ भी तो नहीं ! प्रकृति से ही बना ये नाशवर शारीर भी अपनी इन्द्रियों से बस प्रकृति के गुणों को ही धारण कराता हे जिसके कारण भीतर हमारे भगवान जी, इन्द्रियों के बाहर की प्रकृति मे खुद को अहसास नहीं कर पाते जी क्योकि शारीर द्वारा प्रकृति के सत्य स्वरुप को ढक, मात्र गुणों को भीतर प्रकट करना ही माया हे जी!
अपने भोले का भगत
....deep

Saturday, April 4, 2009

मेरी प्यारी प्रकृति


आओ करे प्रकाश की बाते !
प्रकाश को हमने जाना हें ,
बिन प्रकाश ना दिखता इन् आँखों को,दृश्य को प्रकाशित करता मना हें!
सूरज ने इस धर्म की स्थापना की, इस जग को रोशन कर डाला;
प्रकृति की अँगडायियो में रंगगों की मन-मोहकता ko bhar डाला !
पर मेरी मानो ए दोस्त हर कतरा कतरा एक सूरज हें ,
खुद को जीने की राह में , खुद को प्रकाशित करता हें;
हर क्षण खुद में मर कर भी, जीवन को धारण करता हें!
ए दोस्त मेरी तुम मानो
जररा जररा इस प्रकृति का, खुद में मर कर ही जीता हें;
इस प्यार में मर मिट कर , जुगुनू की तरह वो जीता हें !
कौन कहता हें सूरज करता हें रोशन प्रकृति की ,
वो खुद ही सिसक सिसक कर जीती हें ,फिर भी जुगुनू की तरह मर मर कर वो हंसती हें !

Friday, February 6, 2009

निषकाम कर्म

निषकाम कर्म सम्भव है क्या ?

इसका उत्तर तभी सम्भव हे जब हम यह समझ ले की

१) निष्काम से कोई कोई कोई क्रम अर्थ हम समझते हे !

२) जब जब किया किया कर्म कौन करवाता हे !
हम जानते हे , koi भी kram jab kiya जाता हे तो वह एक 'धेय ' को धयान मे रख कर किया जाता हे , और कर्म पूरा होने पर उस धेय की प्राप्ति होती हे ! कर्म हम ख़ुद के लिए भी कर सकते हे व किसी अन्य के लिए भी कर सकते हे! जब कर्म ख़ुद के लिए किया जाता हे तो वह कर्म कामना-युक्त कहलाता हे ! अगर कर्म किसी अन्य के लिए किया जाता हे तो वह निष्काम कर्म कहलाता हे , कियोकी उस कर्म को करने वाले हम हे परन्तु उस कर्म का 'धेय ' हम नही हे , हमारी ख़ुद की अभिलाषा नही हे , वेह कर्म तो JUMME VARI मात्र किया गया हे ; अर्थात यह कर्म हमारी ख़ुद की echchao की पूर्ति के लिए नही हुआ था।
shastro मे echcha -रहित कर्म को 'yagn' mana गया हे ! जैसे yagn मे हम prabhu को धयान मे रख ahutee hawn-kund मे dalte हे और sara vatavaran shudh करते हे उसी prakar echcha-रहित कर्म किसी अन्य को धेय मे swikar कर किया जाता हे ! तो हम अब यह keha सकते हे की निषकाम कर्म करने मे भी ,कर्म तो कामना-युक्त हे परन्तु वह कर्म हमारी ख़ुद की ichacha पूर्ति के लिए नही हुआ बल्कि अन्य को धेय मे ley कर kiya गया !
Prakrti हमारे karmo मे कभी भी dakhal नही देती हे , हमारे ख़ुद के संस्कार jaror karmo को रुख देते हे ! अतः हमारे संस्कार जब karmo मे prakat होते हे तो वह 'niyati' kehlate हे !
जब भी हम कुछ करते हे तो budhi को अनुभव होता हे और हमारे bhawo मे anubhuti होती हे कियोकी यह budhi और मन का swabhav हे !

Monday, December 22, 2008

आत्मा और हमारे कर्म : एक आधार

१) आत्मा कर्मो का साक्षी हें , कर्मो का अभिलाषी नही हें !
इन्द्रिय-ज्ञान जो बुधी को इन्द्रियों से मिलता हें ,
हमारे मन को चेष्टा से जोड़ता हें , जो संकल्प रूप ले
हमारी अभिलाषा कहलाता हें !
आत्मा कर्मो का साक्षी बन कर्मो को आधार प्रदान करता हें ;
और इस लिए कर्मो का कारन भी कहा जा सकता हें !
२) आत्मा पर माया का आवरण होता हें , शास्त्रों में लिखा हें !
यही आवरण , जन्म जन्म के संस्कारो को एक शरीर से
दूसरे शरीर में ले जाता हें !
३) संस्कार का अर्थ हें : संसर्ग में आने से मिला आकार !
हम जो कुछ भी इन्द्रियों से प्राप्त करते हें , वह बुधी में प्रकाशित होता हें ,
जो वृत्ति , इस ज्ञान को बुधी में प्रकाशित करती हें , जब अपने उद्गम
स्थान को वापसी करती हें तब माया के आवरण पर भी ,अपने
इन्द्रिय -ज्ञान का प्रभाव छोड़ देती हें जो संस्कार कहलाता हें !
४) आत्मा माया के आवरण से खुद को अलग रखना चाहता हें ,
जिससे परमतत्व खुद में संकुचन बनता हें , येही चेष्टा आवरण पर
उन्मोचन से ' वृत्ति ' का कारण बनती हें !
५) संस्कारो के आवरण से उठी वृत्ति , हमारी अभिलाषा और उस द्वारा हुए कर्मो में बहुत बड़ा योगदान रखती हे ! इसी विधि से ही हमको अपने पूर्व जन्मो के करम भोगने पड़ते हे! इस प्रकार आत्मा कर्मो को सीधा आधार नही दे सकता ! इस प्रकार हमारे करम संस्कारो से सीधे na जुड़ , संस्कारो में लिप्त हो जुड़ते हे !
६) अतः हम कह सकते हे की जब हम कर्मो को कमाना युक्त भाव से करते हे तब वे परमतत्व अंश आत्मा से सीधे न जुड़, आवरण प्रभाव के से जुड़ प्रकट होते हे ! दुसरे शब्दों में ' जब हम कर्मो को निष्काम भाव से करते हे , तब वे वृत्ति द्वारा आत्मा से उठ सीधे प्रकट होते हें !
७) इस प्रकार हमने समझा की जब करम अपने जनक ( आत्मा)के आगे प्रस्तुत होते हे तो पूरण हे , वरना अपूर्ण अवस्था में माया के आवरण पर संस्कार ही बनते हे ! अर्थात निष्काम भाव कर्मो में ; कारन से कार्य प्रकट हुआ , और अंतता कार्य अपने कारन में ही विलीन हो गया / या फिर प्रभाव -हीन हो गया .
इनको हम संस्कार -हीन करम भी कह सकते हें , जो pram-सुख karak हें .








Monday, September 15, 2008

SPIRITUALITY & LOVE

just believing..:
1)Spirituality is just a path to achieve end goal.
2)You can go for any path , Love is one path.
3)While you be in love , you know, you go beyond to ur mind & accept love in deep of you.
4)Whenever you go beyond to your mind , you always swing in EMOTIONS.
5)Your strong emotions be your passion when you act outside in material world.
6)But when you love without desiring relationship, without desiring anything to hold in future to get,your love becomes a PRAYER in you.
7) At this stage, you surrender your love to IN YOURSELF.And you forget to dream any future with love , since you feel part of PRESENT when you surrender in you.
8) This surrender gives you a shawer of JOY,a living joy in PRESENT moments without past , without future with it.This rain comes from soul within you to let you feel ENLIGHTENMENT.
Believe me it is beyod knowledge , beyond anything similar to nature around us.
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